महकमा सोया है, जहर जागा है, रोज़ाना पेट में उतरता मिलावट का मीठा जहर!
रायबरेली: त्योहार आता है तो हमारे घरों में मिठास घुलनी चाहिए, लेकिन हकीकत यह है कि मिठास के बहाने जहर परोसा जा रहा है। नवरात्र और दीपावली जैसे पावन पर्व व्यापारियों के लिए सिर्फ़ "सुपर प्रॉफिट सीज़न" बन गए हैं। और इसी सीजन में शुरू होता है मिलावट का काला कारोबार—जहां दूध से बना हर उत्पाद असलियत में रसायनों और पाउडर की फैक्ट्री बनकर रह जाता है।सवाल सीधे-सीधे महकमे से है—जब सबको पता है कि इस समय मिलावट के सौदागर जाग जाते हैं, तो जांच करने वाले विभाग क्यों सोए रहते हैं? क्या सिर्फ़ कागजों पर नमूने लेना और दिखावटी कार्रवाई करना ही उनका फर्ज़ रह गया है? हकीकत तो यही है कि जब तक प्रयोगशालाओं से रिपोर्ट आती है, तब तक जहर इंसानों के पेट में उतर चुका होता है और मुनाफा मिलावटखोरों की जेब में।लालगंज और गुरुबख्शगंज जैसे इलाके हर बार इस गंदे खेल में पकड़े जाते हैं, लेकिन नतीजा क्या निकलता है? वही पुरानी कहावत—“जो पकड़ा गया वो चोर, जो बच गया वही नेता।” आखिर कब तक यह खेल चलता रहेगा?ज़रा सोचिए, इतनी बड़ी आबादी वाले जिले में उतना शुद्ध दूध आता कहां से? पनीर, छेना, खोवा, रसगुल्ला—सब जगह दूध ही दूध, जैसे नल से पानी बह रहा हो। असलियत यह है कि बाजार में बिकने वाली मिठाइयाँ और दूध उत्पाद ‘रसायनशाला’ से निकल कर सीधे जनता की थाली में पहुँच रहे हैं। और प्रशासन की चुप्पी इस खेल की सबसे बड़ी साझेदार है।त्योहारों पर जब लोग खुशी और आस्था में मिठास ढूंढते हैं, तब उन्हें जहर खिलाना सिर्फ व्यापारियों का अपराध नहीं, नियंत्रण तंत्र की नाकामी और मिलीभगत भी है। जब तक कार्रवाई ‘कागजों’ से उठकर ‘सड़क’ और ‘कारखानों’ तक नहीं पहुंचेगी, तब तक हर साल यही जहर नए पैकिंग में बिकता रहेगा।
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